आप लीजिए मेरी चूत के मजे

Aap lijiye meri chut ke maje:

Hindi sex stories, antarvasna रात के वक्त मेरी आंख खुली तो मैंने देखा सार्थक बिस्तर पर नहीं थे मैंने अपनी चादर हटाई और सार्थक को इधर उधर देखा लेकिन सार्थक मुझे कहीं नहीं दिखे। मैं उठकर बाहर अपने बालकोनी में गई मैंने देखा  सार्थक वहां चेयर में बैठे हुए थे मैंने सार्थक से पूछा तुम यहां पर क्या कर रहे हो तुमने टाइम देखा है कितना हुआ है। सार्थक ने मुझे बड़ी धीमी आवाज में कहा तुम आराम से कहो सुनिधि कहीं उठ ना जाए। मुझे कुछ समझ नहीं आया की सार्थक क्यों इतना परेशान हैं और वह रात के 2:00 बजे बाहर बालकोनी में बैठे हुए हैं। मैंने सार्थक को अंदर आने के लिए कहा सार्थक अंदर आ गए मेरी दो वर्षीय छोटी बेटी अभी गहरी नींद में सो रही थी।

हम लोग जैसे ही अपने रूम में आए तो मैंने दरवाजा बंद कर लिया लेकिन तभी बाहर कुछ शोर सुनाई दिया सार्थक ने मुझे कहा रचना क्या तुमने कोई शोर सुना मैंने सार्थक से कहा हां मुझे भी कुछ सुनाई दिया। हम दोनों उठकर बालकोनी की तरफ गए तो मैंने देखा हमारे पड़ोस में रहने वाली बबीता उसके घर की लाइट खुली हुई थी। हम दोनों कुछ देर तक बाहर ही खड़े रहे मुझे कुछ समझ नहीं आया कि माजरा क्या है लेकिन कुछ देर बाद हमें समझ आया कि माजरा आखिरकार है क्या। हम दोनों ही रात के वक्त उनके घर पर चले गए हमने रात के 2:30 बजे उनके घर की बेल बजाई तो अंदर से बबीता के पति ने दरवाजा खोला उनसे हमारा इतना परिचय नहीं था क्योंकि वह अक्सर अपने काम के सिलसिले में इधर उधर ही रहते थे वह काफी घबराए हुए से नजर आ रहे थे। सार्थक ने उनसे पूछा भाई साहब क्या कोई परेशानी है तो वह कहने लगे दरअसल बबीता के पेट में काफी तकलीफ हो रही है और वह पेट से है मुझे लग रहा है उसे अभी अस्पताल ले जाना पड़ेगा। सार्थक ने कहा मैं अभी अपनी कार ले आता हूं सार्थक दौड़ते हुए वहां से पार्किंग की ओर गये और कार ले आये फिर सार्थक ने अपनी कार में बबीता और उसके पति को बैठाया। बबीता काफी ज्यादा तकलीफ में थी लेकिन उसके पति उसे काफी हिम्मत दे रहे थे मैं और सार्थक भी बबिता को कह रहे थे की हिम्मत रखो बस अस्पताल आने ही वाला है।

हम दोनों ने बबीता को अस्पताल तक पहुंचाया उसके बाद बबिता को वहां एडमिट करवा दिया हम लोगों ने बबीता को इमरजेंसी वार्ड में एडमिट करवा दिया था। कुछ ही देर बाद डॉक्टर आए तो डॉक्टर ने बबीता की स्थिति देखी वह कहने लगे लगता है बच्चा बस होने ही वाला है। बबिता के पति ने भी अपने कुछ रिश्तेदारों को भी बुला लिया था उस वक्त सुबह के 5:00 बज रहे थे तभी बबीता को एक नन्हा सा बालक हुआ। बबीता के पति बहुत खुश थे उन्होंने सार्थक और मेरा धन्यवाद दिया और कहा वह तो रात के वक्त आप लोगों ने हमारी मदद की नहीं तो मैं काफी घबरा गया था। बबीता के पति की उम्र यही कोई 27 वर्ष के आसपास रही होगी और उनकी शादी को भी अभी डेड बरस ही हुआ था। हम लोगों ने बबीता के पति से कहा अभी हम चलते हैं संजय ने हमें हाथ जोड़ते हुए कहा मैं आप लोगों का दोबारा से धन्यवाद कहना चाहता हूं। सार्थक ने संजय से कहा आप बेवजह ही हमें पाप का भागीदार बना रहे हैं यह हमारा फर्ज था तो हमने अपना फर्ज पूरा किया यह कहते हुए हमने संजय से इजाजत ली और हम लोग अपने घर आ गए। जब हम लोग घर आ रहे थे तो मैंने सार्थक से पूछा मुझे अभी तक तुमने जवाब नहीं दिया कि आखिरकार तुम इतनी रात को उठकर बाहर क्यों गए थे। सार्थक मुझे देख कर मुस्कुराने लगे और कहने लगे अर्चना तुम भी अब उस बात के पीछे ही पड़ गई हो मुझे नींद नहीं आ रही थी तो मैंने सोचा मैं बालकनी मैं बैठ जाता हूं बालकनी में काफी अच्छी हवा आ रही थी और यदि मैं बाहर नहीं जाता तो शायद हम लोग संजय और बबीता की मदद भी ना कर पाते। सार्थक दिल के बहुत ही अच्छे हैं हम दोनों एक दूसरे को बड़े अच्छे से समझते हैं लेकिन मेरे प्रश्नों का उत्तर उस दिन सार्थक ने नहीं दिया सार्थक को जरूर कोई परेशानी थी लेकिन वह मुझसे कहना नहीं चाहते थे। जब हम दोनों घर पहुंचे तो उस वक्त सात बज रहे थे सार्थक मुझे कहने लगे मुझे ऑफिस के लिए भी निकलना है मैं अभी नहा लेता हूं तुम तब तक मेरे लिए नाश्ता तैयार कर लेना।

मैंने सार्थक से कहा ठीक है तुम जल्दी से नहा लो मैं तुम्हारे लिए नाश्ता तैयार कर देती हूं मैंने सार्थक के लिए आधे घंटे में नाश्ता तैयार कर दिया था और सार्थक भी नहा कर बाथरूम से बाहर आ चुके थे वह भी तैयार हो चुके थे। उन्होंने कहा जल्दी से मुझे नाश्ता दे दो मुझे निकलना है सार्थक ने नाश्ता किया और उसके 15 मिनट के बाद वह अपने ऑफिस के लिए निकल गए। मैं घर पर अकेली ही थी मेरी बच्ची अब तक गहरी नींद में सो रही थी लेकिन कुछ देर बाद वह उठी तो रोने लगी मैंने उसे दूध पिलाया और उसके बाद वह दोबारा से सो गई। मैं घर का काम करने लगी मैं घर का काम कर रही थी तो काम करते करते मुझे 10:30 बज चुके थे तभी मेरे घर की डोर बेल बजी। जब घर की डोर बेल बजी तो मैंने दरवाजा खोल कर देखा तो सामने संजय खड़े थे मैंने संजय को बैठने के लिए कहा लेकिन वह ज्यादा देर नहीं रुके और दरवाजे से ही वह लौट गए। कुछ दिनों बाद संजय ने अपने परिवार के कुछ और लोगों को भी बुलाया संजय ने अपने बेटे होने की खुशी में सब लोगों को पार्टी दी। उसके ऑफिस के भी कुछ लोग आए हुए थे मैं और सार्थक भी उस पार्टी में गये हम लोग ज्यादा देर वहां नहीं रुके और जल्दी ही घर लौट आए। संजय ने बड़ी अच्छी तरीके से सब कुछ अरेंजमेंट किया हुआ था जब सार्थक और मैं घर आए तो सार्थक ने मुझे कहा मैं कुछ दिनों के लिए गांव जा रहा हूं।

मैंने सार्थक से कहा लेकिन क्या कोई जरूरी काम है तो सार्थक ने मेरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा हां मुझे गांव में खेत का सौदा करना है। गांव में हमारी पुश्तैनी जमीन है जिसकी वजह से सार्थक को जाना पड़ रहा था और सार्थक के माता-पिता भी गांव में ही रहते हैं तो सार्थक ने कहा मैं अगले हफ्ते गांव चला जाऊंगा तुम छुटकी का ध्यान रखना। मैंने सार्थक से कहा हां मैं अपना और छुटकी का ध्यान रख लूंगी। अगले हफ्ते सार्थक गांव चले गए सार्थक मुझे बार बार फोन किया करते थे लेकिन अभी भी गांव में उस खेत का सौदा नहीं हो पाया था। मैंने सार्थक से पूछा तुम वापस कब लौटोगे तो सार्थक का जवाब था बस जल्दी ही मैं लौट आऊंगा। मुझे सार्थक की कमी खल रही थी और मैं काफी अकेली भी थी। उस दिन मुझे सार्थक की बहुत कमी खल रही थी मैं अपने घर की बालकनी में खड़ी हो गई और सार्थक को याद करने लगे तभी सामने से संजय अपनी बालकोनी में आ गए वह मेरी तरफ देख कर मुस्कुराने लगे। मैंने भी उन्हे जब देखा तो मैंने भी उन्हे एक प्यारी सी मुस्कान दी वह मुझसे मिलने के लिए आ गए। वह जब घर पर आए तो हम दोनों साथ में बैठे हुए थे और बात कर रहे थे। मैंने संजय से कहा मुझे सार्थक की बड़ी याद आ रही है यह स्त्री और पुरुष का भी अजीब मेल है जब भी कोई किसी से दूर जाता है तो बड़ा ही अजीब महसूस होता है। संजय ने जवाब देते हुए कहा स्त्री और पुरुष के अंगों की बनावट अलग अलग हो सकती है लेकिन वह दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। सार्थक की बातों से प्रतीत होता था कि वह बड़े ज्ञानी किस्म का हैं मेरी उनसे कभी इतनी खुलकर बात नहीं हुई थी हम दोनों की बात चल ही रही थी कि उसी दौरान स्त्री और पुरुष के अंतरंग संबंधों की बात चल पड़ी।

कुछ ही देर बाद हम दोनों अपने आपे से बाहर हो गए संजय ने जब मेरी जांघ को सहलाना शुरू किया तो कुछ देर के लिए मैं भी सार्थक को भूल गई और अपने आपको मैंने संजय के सामने समर्पित कर दिया। सजय के सामने समर्पित होना मेरे लिए बड़ा अच्छा रहा संजय ने जब मेरे होठों और मेरे पूरे शरीर को ऊपर से नीचे तक महसूस करना शुरू किया तो मुझे बड़ा अच्छा लगने लगा काफी देर तक ऐसा ही चलता रहा मैं पूरी तरीके से उत्तेजित हो चुकी थी और मेरी उत्तेजना अब चरम सीमा पर थी। मेरी योनि से गिला पदार्थ बाहर की तरफ को निकल रहा था मैं बिल्कुल भी रह नहीं पा रही थी संजय ने जैसे ही मेरे स्तनों का रसपान करना शुरू किया तो मेरे अंदर से करंट दौड़ने लगा। मेरे अंदर का जोश अब इस कदर बढ़ चुका था कि संजय ने जैसे ही अपने मोटे लिंग को मेरी नरम और मुलायम योनि के अंदर प्रवेश करवाया तो मैं चिल्ला उठी। मेरी योनि से तरल पदार्थ कुछ ज्यादा ही मात्रा में बाहर निकल रहा था संजय के साथ मैं पूरे तरीके से संभोग का आनंद ले रही थी।

संजय ने मेरे दोनों पैरों को खोल कर रखा हुआ था वह जिस प्रकार से मुझे अपने नीचे लेटा कर मेरी योनि के मजे ले रहा था उससे मैं बहुत ज्यादा खुश थी। उसके चेहरे पर साफ तौर पर इस बात की खुशी थी कि वह मेरे साथ सेक्स कर पा रहा है काफी देर तक उसने मुझे अपने नीचे लेटा कर बड़ी तेज गति से धक्के दिए लेकिन जैसे ही संजय ने मेरी चूतडो को पकड़कर मेरी योनि के अंदर अपने लंड को घुसाया तो मैं पूरी तरीके से उत्तेजना में आ गई और जैसे ही संजय का पूरा लंड मेरी योनि में प्रवेश हुआ तो वह मुझे बड़ी तेज गति से धक्के दिए जा रहा था। उसके धक्को में काफी तेजी आ चुकी थी हम दोनों ने सेक्स का भरपूर तरीके से मजा लिया जब संजय का वीर्य पतन होने वाला था तो उसने मुझे कहा मैं अपने वीर्य को तुम्हारी चूत में ही गिरा रहा हूं। मैंने भी संजय को अनुमति दे दी और संजय ने अपने वीर्य को मेरी योनि के अंदर प्रवेश करवा दिया। मैं बहुत ज्यादा खुश थी संजय के चेहरे पर भी एक खुशी थी वह मेरे साथ अच्छे से संभोग कर पाया।


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