अपनी जवानी पर काबू ना रहा

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Apni jawani par kaabu na raha मैं अपने ऑफिस के काम से दिल्ली के लिए निकल रहा था तभी मैंने घड़ी की तरफ देखा तो उस वक्त 7:50 हो रहे थे अब से ठीक एक घंटे बाद ट्रेन आने वाली थी। मैंने अपने छोटे भाई को आवाज देते हुए कहा संकेत क्या तुम्हारे पास समय है वह कहने लगा हां भैया कहिए ना। मैंने संकेत से कहा मुझे तुम स्टेशन तक छोड़ दो मुझे लगता है मुझे टैक्सी लेने में देर हो जाएगी इसलिए तुम मुझे स्टेशन छोड़ दो। वह भी एक आज्ञाकारी भाई की तरह मुझे छोड़ने को तैयार हो गया और मैं अपने बैग के साथ तैयार खड़ा था। उसने मुझे कहा चलिए भैया मैं आपको मोटरसाइकिल में ही छोड़ देता हूं अभी रास्ते में काफी ज्यादा ट्रैफिक होगा तो मोटरसाइकिल से जाना ही बेहतर है। मैंने संकेत से कहा ठीक है तुम मुझे मोटरसाइकिल से ही छोड़ दो संकेत मुझे स्टेशन तक छोड़ने के लिए आया उसने मुझे कहा भैया मैं अब चलता हूं मैंने उसे कहा ठीक है तुम ध्यान से जाना।

एक बड़े भाई की तरह ही मेरा उसे समझाने का फर्ज था मैंने संकेत को समझाते हुए कहा तुम आराम से घर जाना तुम मोटरसाइकिल बड़ी तेज चलाते हो। वह मुझसे इजाजत लेते हुए चला गया मैंने भी देखा की ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 4 पर खड़ी है तो मैं भी प्लेटफार्म नंबर 4 पर चला गया। जब मैं प्लेटफार्म नंबर 4 पर गया तो मैं अपने फोन में देखने लगा मैंने देखा कि मेरी सीट काफी आगे की तरफ है और मैं अपनी सीट की तरफ गया। मैंने देखा मेरी सीट नंबर 32 था और मैं उस पर बैग रख कर बैठ गया मैंने अपने बगल में ही बैग रख लिया था क्योंकि मेरे पास इतना ज्यादा सामान तो नहीं था इसलिए मैंने अपने बैग को बगल में ही रख लिया। मैंने अपनी पानी की बोतल का ढक्कन खोला और पानी पीने लगा तभी मेरे सामने एक लड़की आई और वह कहने लगी कि मेरी सीट नंबर 33 है। मैंने अपने बैग को अपनी सीट के नीचे रख लिया और कहा मैडम आप की यही सीट है वह भी मेरे बगल में बैठ गई उसके लंबे घने बाल और उसका सुंदर सा चेहरा देख मुझे भी अच्छा लगने लगा। मैं भी आखिरकार कुंवारा था मुझे भी लगने लगा कि कहीं मेरा भी चांस ना बन जाए इसलिए मैं उसे बार-बार देखे जा रहा था।

ट्रेन भी अब धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी थी और एक जोरदार होरन के साथ ट्रेन काफी आगे बढ़ चुकी थी ट्रेन अपनी गति पकड़ने लगी और मेरा भी सफर मानो अब शुरू हो चुका था। मुझे नहीं मालूम था कि यह मेरी जिंदगी का भी सफर होने वाला है और मैं बार-बार उस लड़की की तरफ देखता लेकिन वह अपनी किताब में खोई हुई थी उसने अपने गर्दन को नीचे किया हुआ था लेकिन मैं भी कहां मानने वाला था मैंने भी उससे बात करते हुए कहा मैडम आप क्या दिल्ली जा रही हैं। वह मुझे कहने लगी हां मैं दिल्ली जा रही हूं और उसके बाद हम दोनों ने कुछ बात नहीं की करीब आधा घंटा हो चुका था आधे घंटे से हम लोगों ने कोई भी बात नहीं की थी। एक अंकल सामने की सीट पर बैठे हुए थे वह महापुरुष लड़कियों को लेकर शायद कुछ टिप्पणी कर बैठे और उसके बाद तो उस लड़की ने उन्हें खरी-खोटी सुनाई वह अंकल चुपचाप अपनी ऊपर की सीट में जाकर लेट गए उन्होंने उसके बाद कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी। मैं उस लड़की के साहस को तो पहचान चुका था और मैंने जब उसे हाथ मिलाते हुए अपना परिचय दिया तो उसने भी मुझे कहा मेरा नाम सुचिता है मैंने उसे कहा मेरा नाम अबोध है। मैं उसे अपनी नजरो से हटा ही नहीं पा रहा था मैंने सुचिता से पूछा क्या आप पढ़ाई करती हैं वह कहने लगी नहीं मैं पढ़ाई तो नहीं करती मेरी पढ़ाई तो पिछले वर्ष ही पूरी हो चुकी है। मैंने उससे कहा क्या आप लखनऊ में रहती हैं वह कहने लगी नहीं मैं लखनऊ में नहीं रहती मैं दिल्ली में रहती हूं मैं एक सरकारी एग्जाम देने के लिए यहां पर आई थी और मैं अब अपने घर वापस जा रही हूं। वह मुझे कहने लगी क्या आप लखनऊ के रहने वाले हैं मैंने उसे बताया हां मैं लखनऊ का रहने वाला हूं। मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि मेरी बात सुचिता से इतनी हो जाएगी मैं उससे काफी देर तक बात करता रहा रात के 11:00 बज चुके थे और मुझे भी नींद आने लगी मैंने भी सोने का फैसला कर लिया और मैं अपनी सीट पर सोने के लिए चला गया।

मैं काफी गहरी नींद में सो चुका था और जब मुझे नींद आ गई तो ट्रेन अचानक से रुकी और मैंने नीचे जाकर देखा तो सब लोग गहरी नींद में सो रहे थे। सुचिता ने भी चादर ओढ़े अपनी आंखें बंद की हुई थी मैं जब अपनी सीट से नीचे उतरा तो मैंने बाहर गेट पर जाकर देखा तो ट्रेन रुकी हुई थी शायद कोई तकनीकी समस्या की वजह से वह ट्रेन रुकी थी। मैं भी बाथरूम में गया और वहां से मैं वापस अपनी सीट में लौट आया तभी सुचिता कहने लगी क्या ट्रेन रुकी हुई है। मैंने उससे कहा हां ट्रेन रुक रखी है पता नहीं क्या प्रॉब्लम हुई होगी फिर मैं अपनी सीट में जाकर लेट गया। अगले दिन शुबह जब मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो मैंने सुचिता से कहा चलो तुमसे दोबारा मुलाकात होगी। सूचित भी वहां से चली गई और मैं भी अपने होटल की तरफ चला गया मैं जब होटल पहुंचा तो वहां पर सारी व्यवस्था पहले से ही हो चुकी थी। मैं जल्दी से फ्रेश होने के बाद अपने ऑफिस के काम से निकल पड़ा मैं शाम को 5:00 बजे फ्री हो चुका था और उसी दिन मुझे ध्यान आया कि मैं अपने दोस्त से मिल लेता हूं। मैंने अपने दोस्त को फोन किया उससे काफी समय बाद मेरी बात हो रही थी वह भी अपनी फैमिली के साथ अब दिल्ली में ही बस चुका था। मैंने उससे कहा तुम कहां हो वह कहने लगा इतने वर्षों बाद तुम्हें मेरी याद आई। मैंने उसे बताया कि मैं दिल्ली अपने ऑफिस के काम के सिलसिले में आया हुआ था तो सोचा तुमसे मुलाकात कर लूँ। वह मुझे कहने लगा ठीक है तुम मुझसे मिलने के लिए मेरे घर पर आ जाओ मैं तुम्हें अभी अपने घर का एड्रेस भेज देता हूं।

उसने अपने घर का एड्रेस मुझे भेज दिया जब उसने अपने घर का एड्रेस मुझे भेजा तो मैं वहां से ऑटो लेकर उसके घर पर चला गया। जब मैं अपने दोस्त से मिला तो इतने बरसों बाद मिलने की खुशी को मैं बयां नहीं कर सकता था मेरे दोस्त ने मेरी बडी आओ भगत की और मैं बहुत खुश था कि इतने वर्षों बाद मैं उससे मिल पाया। हम दोनों अपने कुछ पुरानी यादों को ताजा करने लगे हम दोनों की दोस्ती बड़ी गहरी थी मेरे माता-पिता हमे हमेशा कहते की इतनी दोस्ती भी अच्छी नहीं होती लेकिन हम दोनों कहां किसी की सुनते थे। उसकी पत्नी से मिलकर भी मुझे अच्छा लगा मैंने उसे कहा अब मैं इजाजत लेता हूं और तुमसे कभी और मुलाकात करूंगा कभी तुम लखनऊ आओ तो तुम मुझसे जरूर मिलना। वह कहने लगा ठीक है जब मैं लखनऊ आऊंगा तो तुमसे जरूर मुलाकात करूंगा। मुझे कहां पता था कि सुचिता भी मुझे मिल जाएगी मैं जब घर से बाहर निकला तो मुझे सुचिता मिली वह मुझे देखते ही कहने लगी आप यहां कैसे? मैंने उसे बताया यहां पर मेरा दोस्त रहता है वह कहने लगी आपके दोस्त का क्या नाम है?  मैंने उसे बताया मेरे दोस्त का नाम ओमप्रकाश है। वह कहने लगी मैं उनको भली-भांति जानती हूं उनका हमारे घर पर काफी आना जाना है। सुचिता मुझे कहने लगी आप कहां रुके हैं मैंने उसे कहा मैं होटल में रुका हुआ हूं और मुझे यहां पर कुछ दिन और रुकना है। सुचिता ने मुझे अपना नंबर दिया और कहने लगी यह मेरा नंबर है मैंने सुचिता से कहा ठीक है मैं तुम्हें फोन करूंगा और यह कहते हुए मैं अपने होटल में चला गया। वहां पर मैं टीवी देख रहा था लेकिन टीवी देखने का मेरा मन ही नहीं हो रहा था और काफी देर तक मैं टीवी देखता रहा।

मैंने सोचा क्यों ना सुचिता को मैं फोन करूं और मैंने उसे फोन कर दिया हालांकि मुझे अच्छा नहीं लग रहा था परंतु फिर भी मैंने सुचिता को फोन किया और उसे कहा कहीं तुम्हें कुछ प्रॉब्लम तो नहीं है। वह मुझसे कहने लगी आप कैसी बात कर रहे हैं हम दोनों की बातो ने कुछ रंगीन मोड़ लेने लगी थी और सुचिता के अंदर जवानी जागने लगी थी मैं तो चाहता ही था कि मैं किसी से बात करूं। रात भर हम दोनों ने बात की तो उस दिन हम दोनों के बीच अश्लील बातें हुई और रात भर मैं सो न सका लेकिन मैं जब अगले दिन तैयार हो रहा था तो सुचिता मुझे कहने लगी मुझे आपसे मिलना था। मैंने उसे कहा अभी तो मैं अपने काम पर जा रहा हूं लेकिन दोपहर तक लौट आऊंगा तो वह मुझे कहने लगी ठीक है फिर मैं भी शॉपिंग करके लौट आऊंगी। सुचिता भी अपनी शॉपिंग पर निकल पड़ी और मैं भी अपने ऑफिस के काम से चला गया था मैं दोपहर के वक्त फ्री हुआ तो मैंने सुचिता को फोन किया वह कहने लगी आप मुझे अपने होटल का एड्रेस दे दीजिए मैं वहीं आ जाती हूं।

वह मुझसे मिलने के लिए होटल में आ गई हम दोनों साथ में बैठे थे और अकेली लड़की को अपने पास देखकर किसका मन नहीं डोलेगा। मैंने सुचिता की जांघ पर अपने हाथ को रखा तो वह मेरी तरफ अपनी प्यासी नजरों से देखने लगी और जिस प्रकार से वह मुझे देख रही थी उससे मैं भी पूरी तरीके से उत्तेजित होने लगा था और मुझे बहुत अच्छा लगने लगा। मैंने सुचिता के गुलाबी होठों का रसपान करना शुरू कर दिया और जिस प्रकार से मैंने उसके गुलाबी होठों का रसपान किया उससे तो वह भी अपने आपको ना रोक सकी और अपने कपड़े उतारने के लिए वह मजबूर हो गई। उसने अपने बदन से कपड़े निकाले और मुझे कहने लगी आप मेरी ब्रा के हुक को खोल देंगे मैंने उसकी ब्रा के हुक को खोला जब मैंने उसे नग्न अवस्था में देखा तो मेरे अंदर से उत्तेजना और भी ज्यादा बढ़ने लगी थी। मैंने उसके स्तनों पर जैसे ही अपने हाथ का स्पर्श किया तो वह भी अपने आपको ना रोक सकी मैंने उसके स्तनों का रसपान करना शुरू किया। उसके स्तनों का रसपान करना मुझे अच्छा लगता मैंने जैसे ही सुचिता की योनि के अंदर अपने लंड को डाला तो उसकी योनि से खून बाहर निकला और मुझे मज़ा आने लगा काफी देर तक हम दोनों एक दूसरे के साथ संभोग आनंद उठाते रहे। जब मेरे वीर्य को मैंने सुचिता की योनि में गिराया तो वह फूली नहीं समा रही थी।


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