होली में फट गई चोली भाग ४

मैं समझ गई कि अब ज्यादा चढ़ गई है दोनों को, और फिर उन लोगों की बातें सुनकर मेरा भी मन मचल रहा था. मैं अंदर गई और बोली, “चलिए खाने के लिये देर हो रही है..!!”
ननदोई उसके गाल पे हाथ फेर के बोले, “अरे इतना मस्त भोजन तो हमारे पास ही है..”
वो तीनों खाना खा रहे थे लेकिन खाने के साथ-साथ ननदों ने जम के मेरे भाई का मज़ाक उड़ाया और गालियां भी दी, खास कर के छोटी ननद ने. मैंने भी ननदोई-सा को नहीं बख्शा और खाना परोसने के साथ में जान-बुझ के उनके सामने आँचल ढुलका देती.
Low Cut चोली में से मेरे जोबन को देख कर ननदोई की हालत खराब थी. जब मैं हाथ धुलाने के लिये उन्हें ले गई तब मेरे चूतड़ कुछ ज्यादा ही मटक रहे थे, मैं आगे-आगे और वो मेरे पीछे-पीछे, मुझे पता थी उनकी हालत. जब वो झुके तो मैंने उनकी मांग में चुटकी से गुलाल सिंदूर की तरह डाल दिया और बोली, “सदा सुहागन रहो, बुरा न मानो होली है.”

उन्होंने मुझे कस के भींच लिया. उनके हाथ सीधे मेरे आँचल के ऊपर से मेरे गदराए जोबन पे और उनका पजामा सीधे मेरे पीछे दरारों के बीच में. मैं समझ गई कि उनका ‘खुटा’ भी उनके साले से कम नहीं है. मैं किसी तरह छूटते हुए बोली, “समझ गई मैं, जाइये ननद जी इंतज़ार कर रही होंगी. चलिए कल होली के दिन देख लूंगी आपकी ताकत भी, चाहे जैसे जितनी बार डालियेगा, पीछे नहीं हटूंगी.”

जब मैं रसोईघर में गई तो वहाँ मेरी ननद कड़ाही की कालख निकल रही थी.
मैंने पूछा तो बोली, “आपके भाई के श्रृंगार के लिये, लेकिन भाभी उसे बताइयेगा नहीं..!?! ये मेरे-उसके बीच की बात है.”
इस पर हँस के मैं बोली, “एक दम नहीं, लेकिन अगर कही पलट के उसने डाल दिया तो….. ननद रानी बुरा मत मानना.!”
वो हँस के बोली, “अरे भाभी, साले की बात का क्या बुरा मानना..??? एक दम नहीं.. और फिर होली तो है ही डालने-डलवाने का त्यौहार. लेकिन आप भी समझ जाइये ये भी गाँव की होली है, यहाँ कोई भी ‘चीज़’ छोड़ी नहीं जाती होली में.”
उसने ‘चीज़’ पर कुछ ज्यादा ही ज़ोर लगाया था.

उसकी बात पे मैं सोचती, मुस्कुराती कमरे में गई तो ‘ये’ तैयार बैठे थे…….

बची-कुची बोतल भी ‘इन्होने’ खाली कर दी थी. साड़ी उतारते-उतारते उन्होंने पलंग पर खींच लिया और चालू हो गए.
सारी रात चोदा ‘इन्होने’ लेकिन मुझे झड़ने नही दिया. जब से मैं आई थी ये पहली रात थी जब मैं झड नहीं पाई, वरना हर रात कम से कम 5-6 बार. इतनी चुदासी कर दिया मुझे कि वो कस-कस के मेरी पनियाई चूत चुसते और जैसे ही मैं झड़ने के करीब होती, कच-कचा के मेरी चुचियाँ काट लेते. दर्द से मैं बिलबिला पड़ती, मेरी चीख निकल उठती. मेरे मन में आया भी कि बगल के कमरे में मेरा भाई लेटा है और वो मेरी हर चीख सुन रहा होगा. पर तब तक उन्होंने चूचकों को भी कस के काट लिया, नाख़ून से नोच लिया. उनकी ये नोच-खसोट और काटना मुझे और मस्त कर देता था. सब कुछ भूल के मैं फिर चीख पड़ी. मेरी चीखें उनको भी जोश से पागल बना देती थी. एक बार में ही उन्होंने बलिष्ठ, लम्बा, लोहे की रोड जैसा सख्त लंड मेरी चूत में जड़ तक पेल दिया.
जैसे ही वो मेरी बच्चेदानी से टकराया, मैं मस्ती से सीत्कार उठी, “हाँ राजा, हा चोद….चोद मुझे….ऐसे ही….कस-कस के पेल दे अपना मुसल मेरी चूत में.”

और ‘ये’ भी मेरी चुचियाँ मसलते हुए बोलने लगे, “ले ले रानी ले. बहुत प्यासी है तेरी चूत ना… घोंट मेरा लौड़ा..!!!”
मेरी सिसकियाँ भी बगल वाले कमरे में सुनाई पड़ रही होंगी, इसका मुझे पूरा अंदाजा था. लेकिन उस समय तो बस यही मन कर रहा था कि ‘वो’ चोद-चोद कर के बस झाड़ दे मेरी चूत. जैसे ही मैं झड़ने के कगार पर पहुँची, पता नही उन्हें कैसे पता चल गया और उन्होंने लंड निकाल लिया.
मैं चिल्लाती रही, “राजा बस एक बार मुझे झाड़ दो, बस एक मिनट के लिये….”
लेकिन आज उनके सर पर दूसरा ही भुत सवार हो गया. उन्होंने मुझे उल्टा कर के कुतिया जैसा बना दिया और बोले, “चल साली पहले गाण्ड मरा…”

एक धक्के में ही आधा लंड अंदर, “ओह्ह…ओह..फटी…फट गई..मेरी गाण्ड.” मैं चीखी कस के.
पर उन्होंने मेरे मस्त चूतड़ों पे दो हाथ कस के जमाए और बोले, “यार, क्या मस्त गाण्ड है तेरी….” साथ-साथ पूछा, “होली में चल तो रहा हूँ ससुरी पर ये बोल कि सालियां चुदवाएगी कि नहीं..???”
मैं चूतड़ों को मटकाते हुए बोली, “अरे सालियां है तेरी, ना माने तो जबर्दस्ती चोद देना.”
खुश होके जब उन्होंने अगला धक्का दिया तो पूरा लंड गाण्ड के अंदर. ‘वो’ मजे से मेरी Clit सहलाते हुए मेरी गाण्ड मारने लगे. अब मुझे भी मस्ती चढ़ने लगी. मैं सिसकियां भरती बोलने लगी, “हाय मुझे उंगली से झाड़ दो….ओह्ह्ह…ओह्ह…मज़ा आ रहा है …ओह्ह्ह…”
उन्होंने कस के Clit को Pinch करते हुए पूछा, “हे पर बोल पहले तेरी बहनों की गाण्ड भी मारूंगा, मंजूर..???”
“हां…हां…ओओह्ह्ह…ओ…हा…अआ…जो चाहो…. बोले तो….. तेरी सालियाँ है जो चाहे करो….जैसे चाहे करो…”
पर अबकी फिर जैसे मैं कगार पे पँहुची उन्होंने हाथ हटा लिया. इसी तरह सारी रात 7-8 बार मुझे किनारे पँहुचा के वो रोक देते, मेरी देह में कम्पन्न चालू हो जाता लेकिन फिर वो कच-कचा के काट लेते.
झडे वो जरूर लेकिन वो भी सिर्फ दो बार. पहली बार मेरी गाण्ड में जब लंड (Penis) ने झड़ना शुरू किया तो उसे निकाल के सीधे मेरी चूची, चेहरे और बालों पे.
बोले, “अपनी पिचकारी से होली खेल रहा हूँ.”

और दूसरी बार एकदम सुबह मेरी गाण्ड में. जब मेरी ननद दरवाजा खटखटा रही थी. उस समय तक रात भर के बाद उनका लंड (penis) पत्थर की तरह सख्त हो चुका था. झुका के कुतिया की तरह करके पहले तो उन्होंने अपना लंड (penis) मेरी गाण्ड में खूब अच्छी तरह फैला के, कस के पेल दिया. फिर जब वो जड़ तक, अंदर तक घुस गया तो मेरे दोनों पैर सिकोड़ के अच्छी तरह चिपका के, कचा-कच, कचा-कच पेलना शुरू कर दिया.

पहले तो मेरे दोनों पैर फैले हुए थे, उसके बीच में उनका पैर, और अब उन्होंने जबरन कस के अपने पैरों के बीच में मेरे पैर सिकोड़ रखे थे. मेरी कसी गाण्ड और सकरी हो गई थी. मुक्के की तरह मोटा उनका लंड (penis) गाण्ड में कसमसा रहा था.
जब मेरी ननद ने दरवाजा खटखटाया, वो एकदम झड़ने के कगार पे थे और मैं भी. उनकी तीन उंगलियां मेरी बुर में और अंगूठा Clit पे रगड़ रहा था.

लेकिन खट-खट की आवाज के साथ उन्होंने मेरी बुर के रस में सनी अपनी उंगलियां निकाल के कस के मेरे मुँह में ठूस दी. दूसरे हाथ से मेरी कमर उठा के सीधे मेरी गाण्ड में झड़ने लगे.
उधर ननद बार-बार दरवाजा खटखटा रही थी और इधर ‘ये’ मेरी गाण्ड में झड़ते जा रहे थे. मेरी गीली प्यासी चूत भी बार-बार फुदक रही थी. जब उन्होंने गाण्ड से लंड निकला तो गाढ़े थक्केदार वीर्य की धार, मेरे चूतडों से होते हुए मेरे जांघ पर……
पर इसकी परवाह किये बिना मैंने जल्दी से सिर्फ चोली पहनी और साड़ी लपेटकर दरवाजा खोल दिया.

(TBC)…


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